Wednesday, June 27, 2007

परछाई से भी पर्दा करो

बंद कमरें में उसे मौसम से शिक़ायत क्यों है
ओस कि बूंदों में नहाओ, फिर हिसाब करो

कौन कहता है उसे चाहत नहीं अब बची उम्र कि
खावाहिश कि तलाश भी किसी वजह से कम तो नहीं
सुन सको तो सुनो उन झरनों कि आवाज विनोद
हर एक बूँद कहती है, बड़ी जल्दी थक गए दोस्त
हर तरफ प्यार हो तो, जीने कि वजह दे दो
अपने दुश्मन को भी हर रोज़ तुम आदाब करो

उसकी आंखें भी तो सच कहती हैं, बहते चलो
उसकी साँसे भी मुझे खिचती हैं अपनी तरफ
वो किसी हसरत से देखती हैं, मुड़ के मुझे
खुद से मैं कहता हूँ, हह... स्वप्न के उस पार चलो
जिस्म कि खुशबू क्या, परछाई से भी पर्दा करो
उससे नफरत भी करो, तो भी बेहिसाब करो

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