Friday, March 17, 2017

पिछले बरस भी बर्ष था मैं, सावन की हुंकार लिए ||

पिछले बरस भी बर्षा  था मैं, सावन की हुंकार लिए |
अब बरसूँ को कैसे बरसूँ , नफरत की बौछार लिए ।
कोई मुझको ना पहचाने, इसका दर्द तो जाने दो ।
तुम भी भूल गए तो नैना बहे न क्यों मझधार लिए ||


Tuesday, January 1, 2013

मेरे इस उन्माद ने मुझको ऐसे भी दिन दिखलाए ।।



मुझसे मिलते रहते हो, तुम भी बिलकुल तन्हा हो ।
नींद से बोझिल रहते हो, जैसे सब कुछ सपना हो ।
कैसे कहूँ मैं अपने मन की, तुम तो सबकी सुनते हो ।
अंतर्द्वंद मेरा अब मुझको जाने कहाँ को ले जाए ।।

काश ये सब कुछ सपना होता, मेरा कोई अपना होता ।
मेरे तजुर्बे को मुझे अपने समझ से ऊपर रखना होता ।
लोग वाह वाह करते, जिक्र तेरा महफ़िलों में होता ।
लेकिन अब ये सब सपना है ये दिल को कैसे बतलायें ।।

शब्द जलाकर राख परोसा हवा बनकर तुम इठलाये ।
सावन बनकर बरस पड़ा, तुम पत्ती बनकर लहराए ।
पुष्प बनकर बिखर गया तुम घर से बाहर ना आये ।
मेरे इस उन्माद ने मुझको ऐसे भी दिन दिखलाए ।।

Saturday, June 16, 2012

काश तुम कुछ और कहते --- Tribute to Mehdi Hassan...

काश तुम कुछ और कहते दफ़न हो जाने से पहले ।
तुझको सुनकर जीने की आदत सी मुझको हो गयी है ।।

तेरी ग़ज़लों ने हमें राहत है बक्शा इस कदर ।
बेसबब तकरार की फ़ितरत सी मुझको हो गयी है ।।

माना की "रंजिस ही सही" बस एक गज़ल है ।
ऐसा लगता है इनसे मुहब्बत सी मुझको हो गयी है ।।

अब तो केवल जन्नत में ही सजा करेंगी महफ़िले ।
दफ़न हो जाने की एक हसरत सी मुझको हो गयी है ।।

Tuesday, September 6, 2011

तेरे दीदार से मरनेवालों की तू परवाह ना कर, तू जरा और संवर तू जरा और संवर |

कुछ कहता है, बस देखा करे आइना बनकर |
संजोये ख्वाब हैं खो जाएँ ना यू ही बिखरकर ||
ये कैसी कशमकश है आज फिर दोनों के अन्दर |
है मुझे सवाल का डर, है उन्हें जवाब का डर ||

तू क्यूं लिखता है मुझे रेत पर अपना समझकर |
मेरी उम्मीद में लिपटा है मेरा वजूद रहवर ||
बढ़ाकर नर्म कोमल हाथ मुझे महसूस तो कर |
तू भी कुछ जाए सिहर, मैं भी कुछ जाऊं सिहर ||

ना मुझे देख यूँ भर भर के नज़र लख्तेजिगर |
मैं हूँ मदहोश और, वक़्त भी अब गया ठहर ||
कशिश दोनों में है तो थाम ज़िगर देर ना कर |
तू मेरा कत्ल तो कर, मैं भी हो जाऊं अमर ||

Monday, October 4, 2010

इतना बरस की अश्क भी छुप जाएँ मेरे, काले बादल से अब यही गुहार लगाता हूँ ||

अपने बारे में लिखकर मैं भूल जाता हूँ |
बरसों बाद उन्हें पढ़कर फिर मुस्कुराता हूँ ||

आज जमाना मुझको कहता है दीवाना |
अखबारों के पन्नों से जब ताज बनता हूँ ||

जिन बातों को कहने में कई वर्ष लग गए |
उन बातों से ही अपना इतिहास बनता हूँ ||

हाथ पकड़ लोगे तो हिम्मत बढ़ जायेगी |
खुद को अब हर रोज़ यही विश्वास दिलाता हूँ ||

इतना बरस की अश्क भी छुप जाएँ मेरे |
काले बादल से अब यही गुहार लगाता हूँ ||

Thursday, September 16, 2010

बातें करनी हो तो कर, मगर जरा जरा ||

जब से ओढ़ा है ये, बवंडर जरा जरा |
आँखों से अब दिखता है, मंजर जरा जरा ||

ख्वाब सजाये ऐसे, जैसे मुट्ठी भर रेत |
हाथ से फिसले है, निरंतर जरा जरा ||

मौत का ये खौफ है या मौत खुद है |
रोज़ पास आता है ये, नस्तर जरा जरा ||

आखरी पन्ने की है ये अंतिम ख्वाहिश |
जस्न के कुछ दिन हों मयश्षर जरा जरा ||

उम्र छोटी हो मगर, यादें हो लम्बी |
बातें करनी हो तो कर, मगर जरा जरा ||

Sunday, April 4, 2010

दिल को जोड़ने और तोड़ने की एक कीमत हो |

कभी उम्मीद से सवाल करो बेवफाई का |
तुम्हें भी वक़्त पे ठहरा हुआ मंजर बना डाला ||
हज़ारों ख्वाहिशों की क्यारियाँ तुमने लगाई थी |
नाउम्मीद के नश्तर ने क्यूं बंजर बना डाला ||

ये आंसू नमक बन चुके हैं तेरे जख्म पर गिरकर |
तुझे बहला सकूं, मुझमें न कोई कवायत बाकी है |
मेरे अफ़सोस और खामोश को रहवर वो कर देंगे |
यही उम्मीद थी उनसे, यही शिकायत बाकी है ||

ख़ुदी में दफन करते हो, ख़ुदी के दफन होने तक |
यूँ फुरशत से अकेले में सिमट के रोकर देखो तुम ||
जो मुझे पे हँसते है खुलकर, मेरी उनसे गुज़ारिश है |
किसी को खोकर देखो तुम, किसी का होकर देखो तुम ||

बहुत तरसा हूँ जीने की वजह को जिंदा रख रख के |
कभी तो मुझसे भी अहसाश और विश्वास रुखसत हो ||
ऐ खुदा दर पे तेरे आया हूँ, इतना अमल कर दो |
दिल को जोड़ने और तोड़ने की एक कीमत हो ||

Wednesday, December 9, 2009

आज फिर अपना रहा हूँ ख़ुद को मैं ||

आज फिर अपना रहा हूँ ख़ुद को मैं |
बेवजह समझा रहा हूँ ख़ुद को मैं ||

गैर भी तलबगार मेरे होते थे कभी |
फिर से ये बतला रहा हूँ ख़ुद को मैं ||

बेखयाली एक वजह थी गम का मेरे |
रोज़ ये दोहरा रहा हूँ ख़ुद को मैं ||

अब भी मुझको दिखती है उम्मीद उसमें |
इस कदर बहला रहा हूँ ख़ुद को मैं ||

Friday, October 16, 2009

क्यूं अचानक आज फिर वो याद आया देर तक ||

आज लिखने बैठा पर लिख न पाया देर तक |
उसकी याद आई तो मुस्कुराया देर तक ||
मुस्कुराते यूँ न जाने कब सिमटकर सो गया |
मुझे ढूँढने आया जो, कुण्डी खटखटाया देर तक ||

आख बोझिल नींद में व्याकुल, उठा जब खाट से |
सामने उसको जो पाया सकपकाया देर तक ||
कौन है जो मुझमें जीने की तमन्ना भर गया |
क्यूं अचानक आज फिर वो याद आया देर तक ||

Monday, June 1, 2009

हम भी बाहों में उन्हें ले कर, उन्हीं के हो गए ||

आज वो नजदीक आए, और मुझ में खो गए

हम भी बाहों में उन्हें ले कर, उन्हीं के हो गए

जिस्म को छोड़ो हमारे रूह तक भी मिल गए

साँसों में ऐसे घुले वो, ख़ुद ही बेशुध हो गए

मौत ने हमको अलग करने की कोशिश की मगर

हम भी बेपरवाह उन्हें लेकर चिता पर सो गए

लोग भी खामोश थे, ये जस्न था या जूनून था

एक नया इतिहास फिर लिखकर सभी घर को गए