Sunday, April 8, 2018

इश्क़ के आसार

इश्क़ में कभी लौटने के आसार नहीं होते ।
मैकदों में उनसे बेहतर फनकार नहीं होते ।।
मिट गए होंगे सैकड़ों आज़ार से तंग आकर ।
राह में अब मेरे साथ के बीमार नहीं होते ।।

Friday, April 6, 2018

उसकी बात

उसने हंस कर जो बात टाली थी।
हम ने दिल में उसे सम्भाली थी ।।
कभी मिल बैठकर कह सुन लेंगे।
रास्ते पर कहां ये बात होने वाली थी।
अब भी महक उठते हैं ये हाथ मेरे।
गजरे से दो फूल क्या चुरा ली थी ।।
खत लिखकर जो कभी भेजे ही नहीं।
सैकड़ों बार उसे खुद ही पढ़ डाली थी।।
वो पल कुछ नहीं, कुछ भी नहीं थे।
फिर भी कई कविता लिख डाली थी।।
विनोद, रहने दो अब, और याद करो।
चुप रहने की कसम जो खा ली थी।।

Thursday, February 15, 2018

मुझे सबृ़ न दे अए खुदा । ये दुश्मनी का दौर है ।।


मुझे सबृ़ न दे अए खुदा ।
ये दुश्मनी का दौर है ।।
है खंजर सबके हाँथ में ।
ये माजरा कुछ और है ।।
ये उधेड़ देंगे इस शहर को ।
ऐसा बाजुओं में जोर है ।।
लाशे बिछी हर मोड़ पे ।
कोहराम चारो ओर है ।।
हम कैसे अपनी बात करें ।
यहाँ चुप्पी में भी शोर है ।।

Wednesday, February 14, 2018

उनके घर क्यों जले जो चूल्हे भी नहीं जलाते हैं ।।

इस कदर तो नहीं आपसी रंजिस सुलझाते हैं ।
जो शिकवा पत्तो से हो तो पेड़ नहीं जलाते हैं ।।
शून्य कर देते उसे जो तेरे हिसाब से गलत है ।
उनके घर क्यों जले जो चूल्हे भी नहीं जलाते हैं ।।

Sunday, December 31, 2017

हाँथ उठाकर बस आवाज लगाते रहना ।।


मेहर-ओ-वफ़ा का ये रस्म निभाते रहना ।
गले मिलो न मिलो हाँथ मिलाते रहना ।।

जुल्फ जैसे की महक उठे गुलशन, इसमें ।
हर एक रोज़ नया फूल लगाते रहना ।।

शौक दरिया है, और तैरना नहीं आता ।
कस्ती डूबे नहीं, पतवार चलाते रहना ।।

ढूंढ ही लेंगे तुझे सैकड़ों की भीड़ में भी ।
हाँथ उठाकर बस आवाज लगाते रहना ।।

Sunday, December 24, 2017

कारोबार-ए-इश्क़

पास-ए-तअल्लुक़ नहीं तो अपने क्या पराये क्या ।
इश्क़ के शुरुआती मराहिल हैं, तो आजमाएं क्या ।।

अभी दिल लगता है मुझे कासा-ए-ख़ाली की तरह ।
अभी खुद रोये क्यों और उसको भी रुलाएं क्या ।।

तेरे किताब-ए-हुस्न के कुछ हर्फ़ ही पढ़े हैं मैने ।
तेरी महफ़िल में जाकर तुझको फिर सुनाये क्या ।।

शरीफ वो भी बनते हैं, जिनके कत्लखाने हैं ।
कारोबार-ए-इश्क़ है, कुछ लूटें कुछ लुटाएं क्या ।।

कारोबार-ए-इश्क़ - business of love
मराहिल - stages
कासा-ए-ख़ाली - empty bowl
पास-ए-तअल्लुक़ - regard for relationship

Friday, March 17, 2017

पिछले बरस भी बर्ष था मैं, सावन की हुंकार लिए ||

पिछले बरस भी बर्षा  था मैं, सावन की हुंकार लिए |
अब बरसूँ को कैसे बरसूँ , नफरत की बौछार लिए ।
कोई मुझको ना पहचाने, इसका दर्द तो जाने दो ।
तुम भी भूल गए तो नैना बहे न क्यों मझधार लिए ||


Tuesday, January 1, 2013

मेरे इस उन्माद ने मुझको ऐसे भी दिन दिखलाए ।।



मुझसे मिलते रहते हो, तुम भी बिलकुल तन्हा हो ।
नींद से बोझिल रहते हो, जैसे सब कुछ सपना हो ।
कैसे कहूँ मैं अपने मन की, तुम तो सबकी सुनते हो ।
अंतर्द्वंद मेरा अब मुझको जाने कहाँ को ले जाए ।।

काश ये सब कुछ सपना होता, मेरा कोई अपना होता ।
मेरे तजुर्बे को मुझे अपने समझ से ऊपर रखना होता ।
लोग वाह वाह करते, जिक्र तेरा महफ़िलों में होता ।
लेकिन अब ये सब सपना है ये दिल को कैसे बतलायें ।।

शब्द जलाकर राख परोसा हवा बनकर तुम इठलाये ।
सावन बनकर बरस पड़ा, तुम पत्ती बनकर लहराए ।
पुष्प बनकर बिखर गया तुम घर से बाहर ना आये ।
मेरे इस उन्माद ने मुझको ऐसे भी दिन दिखलाए ।।

Saturday, June 16, 2012

काश तुम कुछ और कहते --- Tribute to Mehdi Hassan...

काश तुम कुछ और कहते दफ़न हो जाने से पहले ।
तुझको सुनकर जीने की आदत सी मुझको हो गयी है ।।

तेरी ग़ज़लों ने हमें राहत है बक्शा इस कदर ।
बेसबब तकरार की फ़ितरत सी मुझको हो गयी है ।।

माना की "रंजिस ही सही" बस एक गज़ल है ।
ऐसा लगता है इनसे मुहब्बत सी मुझको हो गयी है ।।

अब तो केवल जन्नत में ही सजा करेंगी महफ़िले ।
दफ़न हो जाने की एक हसरत सी मुझको हो गयी है ।।

Tuesday, September 6, 2011

तेरे दीदार से मरनेवालों की तू परवाह ना कर, तू जरा और संवर तू जरा और संवर |

कुछ कहता है, बस देखा करे आइना बनकर |
संजोये ख्वाब हैं खो जाएँ ना यू ही बिखरकर ||
ये कैसी कशमकश है आज फिर दोनों के अन्दर |
है मुझे सवाल का डर, है उन्हें जवाब का डर ||

तू क्यूं लिखता है मुझे रेत पर अपना समझकर |
मेरी उम्मीद में लिपटा है मेरा वजूद रहवर ||
बढ़ाकर नर्म कोमल हाथ मुझे महसूस तो कर |
तू भी कुछ जाए सिहर, मैं भी कुछ जाऊं सिहर ||

ना मुझे देख यूँ भर भर के नज़र लख्तेजिगर |
मैं हूँ मदहोश और, वक़्त भी अब गया ठहर ||
कशिश दोनों में है तो थाम ज़िगर देर ना कर |
तू मेरा कत्ल तो कर, मैं भी हो जाऊं अमर ||