आज लिखने बैठा पर लिख न पाया देर तक |
उसकी याद आई तो मुस्कुराया देर तक ||
मुस्कुराते यूँ न जाने कब सिमटकर सो गया |
मुझे ढूँढने आया जो, कुण्डी खटखटाया देर तक ||
आख बोझिल नींद में व्याकुल, उठा जब खाट से |
सामने उसको जो पाया सकपकाया देर तक ||
कौन है जो मुझमें जीने की तमन्ना भर गया |
क्यूं अचानक आज फिर वो याद आया देर तक ||
Friday, October 16, 2009
Monday, June 1, 2009
हम भी बाहों में उन्हें ले कर, उन्हीं के हो गए ||
आज वो नजदीक आए, और मुझ में खो गए
हम भी बाहों में उन्हें ले कर, उन्हीं के हो गए
जिस्म को छोड़ो हमारे रूह तक भी मिल गए
साँसों में ऐसे घुले वो, ख़ुद ही बेशुध हो गए
मौत ने हमको अलग करने की कोशिश की मगर
हम भी बेपरवाह उन्हें लेकर चिता पर सो गए
लोग भी खामोश थे, ये जस्न था या जूनून था
एक नया इतिहास फिर लिखकर सभी घर को गए
हम भी बाहों में उन्हें ले कर, उन्हीं के हो गए
जिस्म को छोड़ो हमारे रूह तक भी मिल गए
साँसों में ऐसे घुले वो, ख़ुद ही बेशुध हो गए
मौत ने हमको अलग करने की कोशिश की मगर
हम भी बेपरवाह उन्हें लेकर चिता पर सो गए
लोग भी खामोश थे, ये जस्न था या जूनून था
एक नया इतिहास फिर लिखकर सभी घर को गए
Sunday, April 26, 2009
ये मौत देने वाले क्यूं, वाह-वाह में रहते हैं ||
कुछ ख़ास ये मंजिल है, सब चाह में रहते हैं |
कुछ इससे बेख़बर हैं, कुछ राह में रहते हैं ||
मेरे आंसुओं से कह दो, मुझसे निकाह कर लें |
मुझे उम्र देने वाले, अब दरगाह में रहते हैं ||
मेरी लाश से कह देना, चुपचाप दफ़न हो ले |
मुझको मिटाने वाले अब, हर राह में रहते हैं ||
हैं आज हम कल होगे तुम, है ये वक्त का तकाज़ा |
ये मौत देने वाले क्यूं, वाह-वाह में रहते हैं ||
कुछ इससे बेख़बर हैं, कुछ राह में रहते हैं ||
मेरे आंसुओं से कह दो, मुझसे निकाह कर लें |
मुझे उम्र देने वाले, अब दरगाह में रहते हैं ||
मेरी लाश से कह देना, चुपचाप दफ़न हो ले |
मुझको मिटाने वाले अब, हर राह में रहते हैं ||
हैं आज हम कल होगे तुम, है ये वक्त का तकाज़ा |
ये मौत देने वाले क्यूं, वाह-वाह में रहते हैं ||
ये मृत शरीर है किसका, उसका या हमारा ||
उसको देखूं और होश भी रखूं बाकी |
ये इम्तिहान है किसका, उसका या हमारा ||
मदहोश अंजुमन में बेहोश सब खड़े हैं |
ये स्वप्न सा जादू है पर, उसका या हमारा |
उसकी चमक ऐसी, हम सबको फ़ीका कह गए |
ये दोष है गहरा मगर, उसका या हमारा ||
हैं लब्ज़ ये सूखे तो उसको मानते क्यूं नहीं |
ये कशमकश है किसका, उसका या हमारा ||
ये जो हर एक लम्हे पे हँसता हैं बेखोफ होकर |
ये मृत शरीर है किसका, उसका या हमारा ||
ये इम्तिहान है किसका, उसका या हमारा ||
मदहोश अंजुमन में बेहोश सब खड़े हैं |
ये स्वप्न सा जादू है पर, उसका या हमारा |
उसकी चमक ऐसी, हम सबको फ़ीका कह गए |
ये दोष है गहरा मगर, उसका या हमारा ||
हैं लब्ज़ ये सूखे तो उसको मानते क्यूं नहीं |
ये कशमकश है किसका, उसका या हमारा ||
ये जो हर एक लम्हे पे हँसता हैं बेखोफ होकर |
ये मृत शरीर है किसका, उसका या हमारा ||
Tuesday, February 24, 2009
अकेले रोने के लिए भी थोड़ी जगह चाहिए ||
अपनी मर्ज़ी से कहाँ कोई दुखी होता है मगर
कभी-कभी खुश होने को भी कोई वजह चाहिए
कितने मतलबी हो गए हैं जहाँ वाले
सबको ग़म भी चाहिए तो अलग चाहिए
बात दिल की भी कभी सुन लिया करो
बस यही है जिसे तुमसे कुछ नहीं चाहिए
कमरे का कोई कोना खाली रखो विनोद
अकेले रोने के लिए भी थोड़ी जगह चाहिए
कभी-कभी खुश होने को भी कोई वजह चाहिए
कितने मतलबी हो गए हैं जहाँ वाले
सबको ग़म भी चाहिए तो अलग चाहिए
बात दिल की भी कभी सुन लिया करो
बस यही है जिसे तुमसे कुछ नहीं चाहिए
कमरे का कोई कोना खाली रखो विनोद
अकेले रोने के लिए भी थोड़ी जगह चाहिए
Wednesday, December 17, 2008
खुरदरे हाथों से तेरे, जख्म ये छिल जायेंगे ||
रहने दो दिल को अकेले, अब कोई मरहम न दो
खुरदरे हाथों से तेरे, जख्म ये छिल जायेंगे
बस तुम्हारे एक इशारे की हमें दरकार है
हाथ मिलते ही हमारे, अक्स भी मिल जायेंगे
कोशिश करके देख लो मुझको भुलाकर तुम प्रिये
अबकी बारिश में तुम्हारे रूह तक हिल जायेंगे
मुझको भी उम्मीद है अपने खुदा पर ऐ रक़ीब
अबकी सावन में ये सूखे फूल भी खिल जायेंगे
खुरदरे हाथों से तेरे, जख्म ये छिल जायेंगे
बस तुम्हारे एक इशारे की हमें दरकार है
हाथ मिलते ही हमारे, अक्स भी मिल जायेंगे
कोशिश करके देख लो मुझको भुलाकर तुम प्रिये
अबकी बारिश में तुम्हारे रूह तक हिल जायेंगे
मुझको भी उम्मीद है अपने खुदा पर ऐ रक़ीब
अबकी सावन में ये सूखे फूल भी खिल जायेंगे
और तुझको खो दिया |
पास तुम आते रहे और जिंदगी उलझती गई |
जिंदगी सुलझाता रहा और तुझको खो दिया ||
उम्र नज़र तुझपर जो एक सुकून मिली हो कभी |
मुश्किलें अपनाता रहा और तुझको खो दिया ||
रूह में शामिल थे तुम पर मुझको ये ख़बर न थी |
धड़कनें सहलाता रहा और तुझको खो दिया ||
उसके भी दिल में कसक होगी अगर ये प्यार है |
दिल को ये समझाता रहा और तुझको खो दिया ||
जिंदगी सुलझाता रहा और तुझको खो दिया ||
उम्र नज़र तुझपर जो एक सुकून मिली हो कभी |
मुश्किलें अपनाता रहा और तुझको खो दिया ||
रूह में शामिल थे तुम पर मुझको ये ख़बर न थी |
धड़कनें सहलाता रहा और तुझको खो दिया ||
उसके भी दिल में कसक होगी अगर ये प्यार है |
दिल को ये समझाता रहा और तुझको खो दिया ||
Monday, November 24, 2008
तुमने तो वफ़ा किया, कुछ सच बताते क्यूं नहीं
हम बेवफा बन के भी, बहुत कुछ सिखा गए |
तुमने तो वफ़ा किया, कुछ सच बताते क्यूं नहीं ||
अपने शब्दों को सुनकर बहलाता था दिल तेरा |
तुम इश्क गाने वाले, कुछ गुनगुनाते क्यूं नहीं ||
तेरी शर्तों पे भी तुझे करता रहा प्यार मैं |
मेरी शर्तों पे भी थोड़ा मुस्कुराते क्यूं नहीं ||
मुझको तो तेरे रास्तों के पत्थरों से भी प्यार है |
तुम भी थोड़ा बेसबब, नज़दीक आते क्यूं नहीं ||
आईने में जिस्म अब ढूँढा नहीं करते विनोद |
भूलकर वो शक्ल तुम, दिल को मानते क्यूं नहीं ||
तुमने तो वफ़ा किया, कुछ सच बताते क्यूं नहीं ||
अपने शब्दों को सुनकर बहलाता था दिल तेरा |
तुम इश्क गाने वाले, कुछ गुनगुनाते क्यूं नहीं ||
तेरी शर्तों पे भी तुझे करता रहा प्यार मैं |
मेरी शर्तों पे भी थोड़ा मुस्कुराते क्यूं नहीं ||
मुझको तो तेरे रास्तों के पत्थरों से भी प्यार है |
तुम भी थोड़ा बेसबब, नज़दीक आते क्यूं नहीं ||
आईने में जिस्म अब ढूँढा नहीं करते विनोद |
भूलकर वो शक्ल तुम, दिल को मानते क्यूं नहीं ||
Monday, November 17, 2008
दिल लगाकर भी भला कोई गुमशुम रहता है ||
कई दिनों से दिल मेरा गुमसुम रहता है
किसके सपने देख रहा, ये कब कहता है
तुम भी अपना दिल लेकर आ जाओ हमदम
पता तो चले तुझे देख ये क्या कहता है
आंसू पोछ्ते ही, हाँथ महकने लगते हैं
मेरी पलकों पे भी, शायद कोई रहता है
जैसे जिस्म उसका लिपटा हो मेरे बदन पे
आइना भी अब जरा घबराया सा रहता है
है अगर हिम्मत तो सच बता दो जानेमन
दिल लगाकर भी भला कोई गुमशुम रहता है
किसके सपने देख रहा, ये कब कहता है
तुम भी अपना दिल लेकर आ जाओ हमदम
पता तो चले तुझे देख ये क्या कहता है
आंसू पोछ्ते ही, हाँथ महकने लगते हैं
मेरी पलकों पे भी, शायद कोई रहता है
जैसे जिस्म उसका लिपटा हो मेरे बदन पे
आइना भी अब जरा घबराया सा रहता है
है अगर हिम्मत तो सच बता दो जानेमन
दिल लगाकर भी भला कोई गुमशुम रहता है
Wednesday, September 3, 2008
किसको कोसें : कोसी को या किस्मत को ?
हर तरफ़ पानी ही पानी, जाएँ तो जाएँ कहाँ |
ख़ुद को मन बहला रहा, बस कुछ दिनों की बात है |
आ गए तुम भी परीक्षा लेने इस मझदार में |
रहम कर अब ऐ खुदा, बस कुछ दिनों की बात है |
तेरे घर ही आऊँगा, कुछ कर्म निपटा लूँ जरा |
हो गई बिटिया बड़ी, बस कुछ दिनों की बात है |
जिस नदी की धार में परिवार सारा बह गया |
राख बन मिल जाऊँगा, बस कुछ दिनों की बात है |
आसुओं के साथ सारी रौशनी भी धुल गई |
देख ली दुनिया बहुत, बस कुछ दिनों की बात है |
ख़ुद को मन बहला रहा, बस कुछ दिनों की बात है |
आ गए तुम भी परीक्षा लेने इस मझदार में |
रहम कर अब ऐ खुदा, बस कुछ दिनों की बात है |
तेरे घर ही आऊँगा, कुछ कर्म निपटा लूँ जरा |
हो गई बिटिया बड़ी, बस कुछ दिनों की बात है |
जिस नदी की धार में परिवार सारा बह गया |
राख बन मिल जाऊँगा, बस कुछ दिनों की बात है |
आसुओं के साथ सारी रौशनी भी धुल गई |
देख ली दुनिया बहुत, बस कुछ दिनों की बात है |
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