Friday, June 22, 2007

चन्द साँसे देकर हमने रोज़ एक जीवन बिताया


क्यों ये तस्वीर दीवार से चिपकी खड़ी मुझे घूरती रहती थी ? क्या इसे भी वो चेहरा प्यारा लगता था जो लोगों को मेरी आंखो में दिखायी देता था ? क्यूं फिर से मुझे एक अलग सा ख़्वाब अपनी ओर खींचता है ? मेरे जिस्म के हर एक कतरे में एक उम्र भरने कि कोशिश क्यों करता है ? अपनी बची हुई इच्छाओं को एक पोटली में समेटे हुए मैं लोगो के बीच रहकर उनकी नज़रो से बचाना चाहता था | मुझे डर था, कहीँ कोई मुझसे जीने का उद्देश्य ही ना ले जाये | क्यों सब लोग मुझे घेरे रहते थे ? क्या अब भी मेरे अन्दर वही जोश वही उमंग है, जिसके भरोसे मैं दुनिया को जीतने चला था | या मेरी लोगों को दिग्भ्रमित करने कि वो कोशिश सफल हो चुकी है | वो चहरे पे उम्र भर के गम को ढकने वाला नकाब किसी को दिखायी नहीं देता क्या ? या सब उसे सच मानकर दिग्भ्रमित हो रहे हैं |

आज फिर बादल घिर आये हैं , चातक ने चोंच फैला दिए हैं | मोर ने पंख फैला दिए हैं , वातावरण से धुंध छट चूका है| अब मैं उस घूरती तस्वीर को देख मुस्कुरा देता हूं | लोग अब भी मुझे घेरे रहते हैं पर मैं उनकी नज़रों से बचना सीख लिया है | मेरे अन्दर वही जोश, वही उत्साह, वही उमंग फिर से लौटने लगें है | अंतर ये है कि इस बार ये दुगनी संख्या में हैं और ऊपर से कुछ लुटने का भय भी नहीं | अब मैं आंखो से बहती बूंदों कि सच्चायी जान सकता हूं | इतनी उम्दा जिंदगी किसने दी है मुझे ?

क्या ये वही तो नहीं जिसने मुझसे ये सब लूटा था ? अगर ये सच है तो फिर उसको क्या मिला ? अब उसके आंसुओं कि रखवाली कौन करता है ? क्या उसे कुछ खोने का गम तो नहीं ? कौन उसे वो सब देगा जो उसने मुझे दुगनी संख्या में लौटाया है ? क्या उसे जीने के लिए इन सब चीजों कि ज़रूरत नहीं होगी ?

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