Wednesday, August 15, 2007

आजादी

कैद कर पिंजरे में मुझको थक गया हूँ उड़ते उड़ते |
इन भटकती गलियों में थक गया हूँ मुड़ते मुड़ते ||

जिसके लिए मरे देशभक्त उस आजादी ने क्या सिखलाया |
अपने मंदिर मस्जिदों कि सीढ़ीयाँ चढ़ना सिखलाया ||
देश कि एक सीढ़ी होती मरते जिसपर चढ़ते चढ़ते |
कैद कर पिंजरे में मुझको थक गया हूँ उड़ते उड़ते ||

आजादी मिली है सबको बोलने कि अपने मन कि ||
शब्द ही जब छीन गए हों क्या कहे कोई अपने मन कि ||
अपने घर के दुशमनो से थक गया हूँ लड़ते लड़ते |
कैद कर पिंजरे में मुझको थक गया हूँ उड़ते उड़ते ||

1 comment:

Unknown said...

Very well described today's human condition