कैद कर पिंजरे में मुझको थक गया हूँ उड़ते उड़ते |
इन भटकती गलियों में थक गया हूँ मुड़ते मुड़ते ||
जिसके लिए मरे देशभक्त उस आजादी ने क्या सिखलाया |
अपने मंदिर मस्जिदों कि सीढ़ीयाँ चढ़ना सिखलाया ||
देश कि एक सीढ़ी होती मरते जिसपर चढ़ते चढ़ते |
कैद कर पिंजरे में मुझको थक गया हूँ उड़ते उड़ते ||
आजादी मिली है सबको बोलने कि अपने मन कि ||
शब्द ही जब छीन गए हों क्या कहे कोई अपने मन कि ||
अपने घर के दुशमनो से थक गया हूँ लड़ते लड़ते |
कैद कर पिंजरे में मुझको थक गया हूँ उड़ते उड़ते ||
1 comment:
Very well described today's human condition
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