Saturday, April 21, 2007

मझधार कहॉ से लाऊँ

आग उगलती गर्मी मे,
झंझाड़ कहॉ से लाऊँ |
भूखे झरने नंगे पेड़,
पतवार कहॉ से लाऊँ ||

व्याकुल तन मे नयी उमंगें,
भरके जो झकझोर दे मुझको |
चिंतित मन ये सोंच रहा,
मझधार कहॉ से लाऊँ ||

कौन हमारा अपना था और,
क्या था जो वो छुट गया |
कौन हमारे मन मंदिर में,
आकर मुझको लूट गया ||

सभी ख़ुशी में नाचें वो,
संसार कहॉ से लाऊँ |
चिंतित मन ये सोंच रहा,
मझधार कहॉ से लाऊँ ||

बारीश, बूंदें, गीले पत्ते,
अपनी अपनी किस्मत है |
गर्म रेत पर पांव जलाना,
कहां सभी कि आदत है ||

सूरज भी फीका पड़ जाये,
वो श्रंगार कहॉ से लाऊँ |
चिंतित मन ये सोंच रहा,
मझधार कहॉ से लाऊँ ||

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