आग उगलती गर्मी मे,
झंझाड़ कहॉ से लाऊँ |
भूखे झरने नंगे पेड़,
पतवार कहॉ से लाऊँ ||
व्याकुल तन मे नयी उमंगें,
भरके जो झकझोर दे मुझको |
चिंतित मन ये सोंच रहा,
मझधार कहॉ से लाऊँ ||
कौन हमारा अपना था और,
क्या था जो वो छुट गया |
कौन हमारे मन मंदिर में,
आकर मुझको लूट गया ||
सभी ख़ुशी में नाचें वो,
संसार कहॉ से लाऊँ |
चिंतित मन ये सोंच रहा,
मझधार कहॉ से लाऊँ ||
बारीश, बूंदें, गीले पत्ते,
अपनी अपनी किस्मत है |
गर्म रेत पर पांव जलाना,
कहां सभी कि आदत है ||
सूरज भी फीका पड़ जाये,
वो श्रंगार कहॉ से लाऊँ |
चिंतित मन ये सोंच रहा,
मझधार कहॉ से लाऊँ ||
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